Some pages from my diary…

अक्टूबर ०१, २००६
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आज मन कर रहा है की डायरी लिखू . यो तो काफी दिन पहले से ही मन कर रहा था , पर  आज मूड हो आया . डायरी लिखने का भी अपना ही मजा है. जब सब कुछ शांत हो, सारी भावनाए उथल पुथल मचा रही हो अगर बहार बारिश हो रही हो तो क्या कहना ! काफी दिन से घर को ‘मिस’ कर रहा हू. चार महीने पहले ही गया था. वह पर दिन बहुत लम्बे हो जाते है. दो तीन दिन तो अच्छे लगते है फिर बोरियत होने लगती है लेकिन फिर भी मन बार बार घर की और भागता है . इस मेट्रो की भाग दोड दिमाग को तो भाती है पर पर दिल वही पर है नाहर के पुल पर बच्चा पार्टी के साथ . वही झडवेरी के ‘बेर’ और गन्ने के खेत, और बच्चो के साथ बातें . अभी थोडा सा ही लिखा है और दिल हल्का हो गया.

बचपन के दिन याद आतें है तो हँस लेता हूँ . मम्मी कहती जब छोटा था तो हवा मैं कुछ कुछ लिखता था इसलिए जल्दी प्रिमरी मैं दाखला दिलवा दिया. काफी छोटा था इसलिए हेड-मास्टर नही उम्र बड़ा कर लिखी और मेरा जन्मदिन २५ मार्च १९८६ के बजाये ५ जून १९८५ हो गया . लगभग ९ महीने बड़ा.. हेहेहे !! नाम तो बस, मम्मी ने दिया ‘अमर’ और बुआ जी ने  लिखवा दिया ‘दिलावर ‘ . अब लोग हस्ते है की ये ‘दिलावर’ है. अरे भाई कैसे समझाऊ की इसमें मेरी क्या गलती है , मैं इतना छोटा था मुझे क्या पता था की नाम मैं कुछ रखा है . पर जो भी हो नाम तो मस्त, ज्यादातर लोग भूलते नहीं है हे हे हे :-)

घर मैं मझला होना यानी वाट लग गयी . बड़ो का रोब सहो और छोटो पर रोब जमाव तो घर वालो की डाट सहो. एक भोला सा, मासूम सा, मोटा सा बच्चा इतना सब कैसे सहता, बेचारा टुबक टुबक के दो चार आंसू बहा लेता और थोड़ी देर ब्ड़ फिर वही पागलो टाइप हसना और फालतू की बक बक. घर मैं सब परेशान की ये बच्चा इतना क्यों बोलता है. पापा से कई बार डांट खाई, मम्मी भी डांटती थी की ज्यादा नहीं बोलना चाहिए. और दादी तो मस्त! कुछ भी करो पर न बोले, मेरी प्यारी दादी आजकल चस्मा पहनती है . ज्यादा बूढी हो गयी है और बोलती है की मेरी उम्र की क्या है :-) हाँ फिर ९० साल कोई उम्र थोड़े ही ना है .

ज्यादा तो याद नहीं है दादा जी के बारें मैं, दादी कभी कभी बताती है बहुत ही ज्यादा मेहनती और कंजूस इंसान थे कभी ना दादी को साडी खरीद कर दी और न गहने बनवाए और अपने बेटे को भी वैसा बना गए. आज भी कभी कभी पुराने दिनों को याद करके दादी का गला भार आता है . ‘हरित क्रांति’ से पहले हालत बहुत ही ज्यादा ख़राब थी. फसल का तो कोई भरोसा नहीं, बारिश कम हो या ज्यादा दोनों ही हालत मैं बधिया बैठ जाती थी . गेहू तो मानो सोना था. थोडा बहुत होता था वो भी मेहमानों के लिए रख्खा जाता था. पापा बताते है की जब मेहमान लोग आते थे सब बहुत खुश होते थे की आज गेहू की रोटी मिलेगी . चावल और धान की कोई कमी नहीं थी और तीन चार साल का राशन मिटटी के गोदाम में रख्खा जाता था ताकि एक दो साल फसल न हो आराम से जिया जा सके. किसी की आँखों मैं बड़े सपने न थे. नौकरी करना तो जैसे पाप था . किसी दुसरे की गुलामी क्यों करे . घर की खेती है खुद करो. लेकिन फिर भी पढाई के लिए जो इज्ज़त मैंने अपने घर मैं देखी है वैसी मुझे कही और बहुत कम दिखती है . पढाई के बारें में मेरे दादा जी का ख्याल था की पढ़ लिख कर आदमी इंसान बनता है, बोलने चलने का सलीका आता है . पिताजी के बिचार थोड़े ‘commercial’  है उन्होंने नौकरी और पैसे को भी साथ जोड़ दिया है . पुराने टाइम मैं गाँव के लोग कुछ ज्यादा ही ख़राब थे . गुटबाजी बहुत होती थी और मेरे दादाजी गाँव से अलग रहते थे. हालाँकि मेरे पापा अकेले बेटे थे और सबकी आँखों के तारे फिर भी आदत मैं वोह दादाजी से भी आगे निकले . नशेड़ियों के गाँव में एक आदमी जो बीडी शराब को हाथ न लगाये, अशंभव नहीं पर मुश्किल तो जरुर है.

दादाजी के आखरी दिनों मैं ४ साल का था. मुझे अभी भी याद है की मैं इमली के पेड़ के निचे उनके साथ चारपाई पर बैठ कर दाल खाता था बिना रोटी के साथ. दादाजी को diabetes थी. मिठाई खाने का बड़ा शौक था उन्हें. लम्बी चौड़ी कद कांठी, ताकतवर, कई बार झगड़ो मैं उन्होंने कई की पिटाई  की. एक अकेला आदमीं और पूरा गाँव दूसरी ओर. १५ साल तक कोई नेयोता नहीं देता था. ओर ना ही दादाजी ने कभी किसी से कुछ कहा. फिर भी उन्होंने हिम्मत ना हारी. १५ साल तक एक सोसाइटी से अलग रहना. पापाजी तो उन दिनों की बात ही नहीं करते. अक्सर दादी बताती है तब समझ मैं आता है की दादी को इतना गुस्सा क्यों दिखाती है गाँव वालो के लिए. खेर मैं कुछ ज्यादा नहीं कहना चाहूँगा मुझे खुद बुरा लगता है.

दादाजी के मरने से ४ महीने पहले मेरा छोटा भाई दिनेश पैदा हुआ. दादाजी उसको देखकर बोलते थे, “इसका मुह तो लौंडियों जैसा है.” मम्मी कभी कभी  कहती थी की इसकी जगह मुझे बेटी होती तो अच्छा होता. घर के काम मैं तो हाथ बाटती. दिनेश हमेशा ही गुस्सा हो जाता था, बोलता था, “मेरी जगह क्यों, इसकी (मेरी) जगह क्यों नहीं. ये मोटा क्या कोई तीस मारखा है .” :-)

दादाजी की मौत होते ही सब ख़त्म सा हो गया था. पापा को ही सारा काम हाथ मैं लेना पड़ा. दादाजी हमेशा ही पापा को लताड़ते थे की इतना शर्मीला है कैसे काम करेगा. किसी से बात नहीं करता ओर पीछे खड़ा रहता है.” १८ साल की उम्र ओर पूरी गृहस्थी ऊपर, पर दादी थी न. सब कुछ संभल गया. पापा की शादी कांठ से हुईं है ओर मम्मी सबसे अमीर परिवार से थी. फिलहाल तो मामा लोगो के रबेय्ये से वह से हालत ज्यादा ठीक नहीं है फिर भी खाता पीता परिवार है. दादाजी का घर तो कोई खास नहीं था पर शायद पापा जी के मेहनती स्वाभाव के ऊपर नाना जी फ़िदा हो गए हो ओर शादी हो गयी. गाँव में अक्सर शादिया छोटी उम्र मैं ही हो जाती है. पापा भी शायद १६-१७ साल के रहे होंगे. पर लगता तो नहीं की कभी किसी बुजुर्ग की सलाह की जरुरत रही होगी.

पापा ने ट्रक्टर ख़रीदा, जमीन खरीदी ओर पिछले २० साल मैं ज्यादा से ज्यादा १९ बार कपडे बनवाए होंगे. बचपन में मुझे उनसे बड़ा डर लगता था. पापा घर में और  मेरी जवान मेरे पेट मैं पहुच जाती थी. छोटे भाई को कोई गम नहीं छोटे हो तो सब माफ़. बड़ा भाई दिगराज बहुत डरता था . पापा उसे पढ़ाते थे गलती  पर बहुत मारते थे. बड़े भाई पर क्या गुजरा बचपन में, कैसा रहा वोह तो वो ही जाने पर उसे हम पर रोब ज़माने मैं बड़ा मजा आता था. पता नहीं कहा से नए नए फंडे लाता था. जैसे कोई जादुई शरबत जिसे पीकर आदमी ५ गुना ताकतवर हो जाता है. दिनेश और वोह तो ताकावर हो जाते और मल्ल युद्ध किया करते थे पर मेरा पेट ख़राब हो जाता था . दोनों ही मुझे मार लिया करते थे, एक ही जगह मैं उनसे आगे था वोह था स्कूल , जहा पर मेरा ही राज था. पापा को घर में शोर से बहुत नफरत थी और यहाँ तीन बच्चे , तीनो शैतानो के बाप. खेर हम तीनो पूरा ख्याल रखते थे की पापा के आते ही ‘कोमा’ में चले जाये.

मुझे पहले से ही त्योहारों, शादियों से कोई लगाब नहीं था. दिनेश का भी कुछ ऐसा ही था पर मेरा बड़ा भाई दिगराज उसे ही जाना अच्छा लगता था. घर से बहार मेरी बोलती बंद हो जाती थी. मैं तो किसी कोने मैं बैठकर किताब लेकर चुपचाप टाइम काटता था और बापस घर जाने की राह देखता. शादियों मैं मेरी भूख ही  मर जाती और घर पहुचकर मुझे खाना जरुर खाना  था.

बचपन मैं मुझे दूध का बहुत शौक था कुछ ज्यादा ही. खूब दूध पीकर सोना और बिस्तर गीला करना. पता नहीं क्यों घर में दूध नहीं होता था? क्यों गाये भेश  ढंग से दूध नहीं देती थी और दूध में मम्मी पानी क्यों मिलाती थी, अजीब बात थी. फिर पापा ही मौसा जी के साथ जाकर एक गाये लाये थे. तब से आज तक कभी घर पर दूध की कमी नहीं हुई. वोह गाये तो मर गयी पर उसके बच्चे अभी भी घर पर है. कुछ शैतान से, कुछ भोले से कुछ न्यूट्रान टाइप, न कूदते है न उछलते है , बस खाना और सोना, खाना सोना. दादी बोलती है, खाओ जा, हगो जा , खाओ जा, हगो जा.

सुबह सुबह मंदिर में जल चढाने की सनक कब सवार हुईं पता नहीं. ५ साल की उम्र से  १६ साल की उम्र तक, चेन्नई आने से पहले, लगभग १० साल तक ये ही चला. सुबह नहाना, फिर जल चढ़ाना, एक दो आरती और शलोक बगेरह बगेरह . धीरे धीरे भगवन से बिश्वास टूटने लगा और न ही हिम्मत हुई की अविश्वाश करू . खेर नास्तिक हो गया हू और आस्तिक होने का कोई चांस भी नहीं है. घर जाता हू  तो अभी भी जल चढ़ाता हू., वोह सिर्फ मंदिर की साफ़ सफाई के लिए.

बचपन की यादे काफी कुछ धुंधली सी है. मम्मी पापा से मार पड़ने के episodes लिखाकर अपनी बेईज्ज़ती क्यों करवाऊ. :-)

प्राइमरी स्कूल तीसरी क्लास से आगे की कुछ यादे बची है. क्लास का मोनिटर और सबसे छोटा. पर बुध्धिमान बच्चो पर कोई हाथ नहीं उठाता ऊपर से में तो मोनिटर, अपना  ही राज था. प्राइमरी के लिब्ररी से विज्ञानं की किताबे पढने का मुझे addiction सा था और कविताओ का भी . कुछ कविताये मुझे अभी भी याद है जैसे,
               गधे ने अखबार पलटकर नजर एक दोडाई,
               बोला गाड़ी उलट गयी है गजब हो गया भाई.
               कौया हसकर बोला अबे उल्टा है अखबार,
              इसलिए दिखती है उलटी, सीधी मोटरकार .
हा हा हा हा .. :-)

मेरी पहली और आखिरी research नोटबुक जो मैंने ४ रूपये में खरीदी थी और १ रुपए के डोट-पेन से लिखी थी अभी भी मेरे पास है. आधी ३ दिन में भर डाली बाकी आधी आज तक नहीं भर पाई. मेरे बचपन के दोस्त, दोस्त नहीं classmate, हमेशा मेरे पीछे पड़े रहते थे, किसी तरह से डांट लगे इसे. पर उन्होंने कभी झूट बोलकर डांट नहीं लगवाई और सच पर डांट लगती है तो लगे, विवेकानंद की किताब में कुछ ऐसा ही लिखा होता है. primary की classes को कट गयी धूपघडी बनाते बनाते जिसने कभी सही टाइम नहीं बताया. उधर मेरे एक मामाजी का स्वर्गवास हो गया. छोटे मामा जी. हम उन्हें इसी नाम से बुलाते थे और मुझे बहुत ही पसंद थे. मुझे क्या सभी बच्चो को पसंद थे. लम्बी लम्बी मूंछे, ताकतवर इंसान और नंबर एक के गान्झा पीने वाले. ८-१० साल की उम्र में घर से १५ हजार लेकर भाग गाये थे फिर १५ साल तक कभी असाम, नागालैंड और चीन के बोडर्स तक रहे. ज्यादा कहानी तो नहीं सुनाई  वहा की उन्होंने. नानाजी के मरने के टाइम वो बापस आ गये और फिर घर पर ही रहे. उनकी शादी हो गयी और चार बच्चे भी. इससे बुरी खबर मैंने कभी नहीं सुनी थी. घर पर मम्मी रो रही थी और दादी भी फिर अचानक बहुत सारी औरते आकार के साथ रोने लगी. पापा घर से बाहर चले गये और में भी उनके पीछे पीछे. बड़ा भाई  और छोटा भाई टुबक टुबक  रो रहे थे. मेरे भी एक दो आंसू गिरे होंगे पर में तो घर से भाग गया था. मामा जी को साप ने काटा था वो तो पता नहीं चला पर था कोई जहरीला जानवर. में उस दौरान कभी कांठ नहीं गया बाद में पता चला की नानी जी रो रोकर पागल हो गयी है और दो तीन साल बाद वोह भी चल बसी. बड़े मामाजी बड़े ही फट्टू किस्म के इंसान है. कामचोर और बड़ी मामी तो उनसे भी आगे है औए अकल में एकदम कम. खेर जैसे तैसे छोटी मामी की हालत तो सुधर गयी और घर अब बिलकुल सही हालत में है.

हमारे घर पर बाहर सड़क की और एक इमली का पेड़ था . था इसलिए क्युकी  अब नहीं रहा. एक बार ३ महीनो तक कुहरा छाया रहा था शायद १९९८ में, तब वो पेड़ सूख गया. मुहल्ले के सारे लोग गर्मी में उसके नीचे सोते थे और बाकी ताश खेलते थे. मुझे ताश देखने में बड़ा मजा आता था. खांसी गाली गलोज होती थी खेर ये तो गाँव वालो की   बोली की शान है. यहाँ तो किसी मेहमान को भी एक तो तो सुन ने को मिल जाती है. मैंने भी ताश खेलना सिखा और खूब खेला. कई बार डांट भी पड़ी मम्मी से, बोलती थी तेरे पापा नहीं खेलते फिर तू क्यों खेलता है. मुझे कुछ समझ में नहीं आता था की इसमें क्या बुरे है , बचपन में क्यों समझ में आता मस्त खेल चल रहा है तो खेलो. को अगर नहीं खेलता तो मैं क्या करू. पर मैं ख्याल रखता था की. ज्यादातर चोरी छिपे ही खेलता था . गुल्ली डंडा और कंचे तो गाँव के बच्चे जरुर ही खेलते है. धूल भरी जम्में पर चड्ढी और बनियान में, पूरी दुनिया गयी घास चराने , हम तो कंचे खेलेंगे . खेलो में मैं तो हमेशा ही फिस्सडी रहा पर खेलने में पूरा मजा आता था. यहाँ तो हारना भी जीतने से अच्छा था खेलने को तो मिलता था.

प्राइमरी के हर साल की परीक्षा के ब्ड़ रिसल्ट्स में मैं अव्वल आता था पर पते की बात यह की कक्षा ४ और ५ को चोरकर किसिस और कक्षा की कॉपी चेक ही नहीं होती थी. सिर्फ इन्टरनल मिलते थे और मेरे जैसे आज्ञाकारी और होनहार बच्चे से भला अच्छा कोई हो सकता था जो मास्टर जी को चाय पिलाता हो वो भी ताज महल. :)

स्कूल में एक अध्यापक आये थे पास के कसबे स्योहारा से, श्री शिवप्रकाश शर्मा ! शर्मा, वर्मा, श्रीवास्तव बगेरह बगेरह नाम सुनते ही कुछ ऐसा लगता था की कोई बड़ा आदमी है . दूरदर्शन की फिल्म्स में सभी नाम ऐसे ही होते थे और कारो मैं घूमने वाले . मुझे तो कार से ज्यादा उनके घर अच्छे लगते थे . बड़े बड़े बंगले. मस्त लगते थे. वैसे कार भी अच्छी थी. गुरूजी सबसे अच्छे अध्यापक थे . उनके पढ़ाने का तरीका अभी भी याद है , बहुत अच्छा था. मैंने उन्हें बहुत चाय पिलाई. रिश्वत नहीं गुरु सेवा. :-) वो जब गिनती पहाड़े करवाते थे तो लगता था की स्कूल सजीव हो गया है. भयानाक शोर मचता था. सब बच्चे खूब तेज़ एक ही स्वर में दोहराते थे . गाँव वालो हो दूर दूर तक खेतो में पता चल जाता था की १२:३० बज गाये है . स्कूल की ईमारत बहुत ख़राब थी, बारिश होती थी तो छत टपकती थी और छुट्टी करनी पड़ती थी और रजिस्टर कही किसी  के घर पर रखने पड़ते थे. सब भीगते भीगते घर जाते थे. मम्मी घर पर चाय पिलाती, एक दो छींक आती और बाकी सब फिर से बढ़िया. आस पास के ३ गाँव मैं सिर्फ एक ही स्कूल था . लड़के लडकिया सभी पढने आतें थे . ज्यादातर लड़के और लडकिया काफी बड़े थे. मेरे ग्रुप में सभी छोटे और पढने वाले थे इसलिए कभी मल्लों ही नहीं पड़ा की छज्जू सोना को इतना क्यों घूरता है और कमल राजू को देखकर इतना क्यों हस्ती है. अपुन तो गिनती पहाड़ो में ही मस्त थे . बाद मैं काफी कुछ पता चला पर अच्छा हुआ मेरे साथ वोह सब नहीं हुआ जो कवेंद्र के साथ हुआ.

खेर स्कूल की नयी बिल्डिंग बनी और हमारी क्लास अब उसमे होती थी. बारिश की कोई टेंशन नहीं. पर बारिश के बाद जो कीड़े मकोड़े बिल्डिंग मैं घुस आते थे उसके साथ शैतानी करने का अपना ही मजा था. बेचारे छोटे मोटे कीड़े, क्या दुर्दशा की जाती थी उनकी. हेहे :-) . नया संदूक और एक अलमारी भी आई और ऊपर लिखा गया “प्रथमीक विद्यायल निचलपुर”.

गाँव में उस टाइम जिस तरह स्वतंत्रता दिवस, गद्तंत्रता दिवस और गाँधी जयंती मानते थे फिर वैसी नहीं मनाई . तब दिल में ऐसी ही तरंगे उठती थी जैसी उसे ऑनलाइन देखकर उठती है. तिरंगा हाथ में लेकर मंडली में सबसे आगे चलना और नारे लगवाने का मजा ही कुछ और था. १५ अगस्त तो ठीक थक गुजर जाता था पर २ अक्टूबर और २६ जनवरी को जब नाक बंद होती थी सर्दी के मारे तो “महात्मा गाँधी की जय” की जगह “महात्मा गंडी की जय” निकलती थी मुह से. बच्चे लोग भयानक हस्ते थे. वैसे ऐसा दो तीन बार ही हुआ होगा. फिर भी ‘वन्दे मातरम, भारत माता की जय, शहीद सेनानी अमर रहे, सरे जहासे अच्छा हिन्दुस्ता हमारा. देश प्रेम की ज्वाला की जल पड़ती थी. अमूल का विज्ञापन भी कुछ कुछ ऐसी ही भावनाए पैदा करता था . ‘भारत उदय’ और ‘रंग दे बसंती’ ‘स्वदेश’ ‘लक्ष्य’ से भी उसी टाइप की भावनाए जागती है. पर इन सबमे दिमागी तिकड़म शामिल है. उस नन्हे दिल में कुछ काला था ही नहीं जिसे सफ़ेद  बनाने की कोशिश की जाए. हाथ मैं तिरंगा लेकर चलना मानो देश  का सेनापति हो और फिर अपने घर के आगे से गुजरो और पापा को मुश्कुराते देख लिया तो बस, बोलती बंद. गुरूजी फिर खुद नारे लगवाते थे उशे पता था घर के सामने ये शर्माता है. आज भी झाकी देखना चाहता हुईं पर यहाँ मेट्रो में dy/dx, laplas और fourier  में ही व्यस्त रहता हू.

घर पर किसी नही सपने मैं भी नहीं सोचा होगा की मैं इंजिनियर बनूँगा या बड़ा भाई pharmacist और छुटंकी botanist . खेर २/३ तो पूरी हो गयी है बस दिनेश का बोतानिस्ट बनना नाकि है (update : Dinesh is a chemist now!). ज्यादा से ज्यादा पढ़े तो हाई स्कूल और कही गलती से इंटर पास कर लिया तो सुगर मिल में चौकीदारी पक्की. वैसे इन गवारों के बस मैं इंटर पास करना नहीं है. बचपन में यही सब सुनता था. इंजीनियरिंग शायद तब इसका कोई मतलब भी जनता हो. मुझे तो खेर अपनी किताबो से मतलब था, लाल बहादुर शाश्त्री, जवाहर लाल नेहरु, भगत सिंह, बिस्मिल बगेरह बगेरह की तो जीवनी चाट गया मैं पर उनकी DOB आज तक याद नहीं हुईं.

मेरे एक मौसा जी प्राइमरी मैं अध्यापक है, और सारे रिश्तेदारों मैं सबसे ज्यादा पढ़े लिखे भी. M Sc  in  Agriculture . काली बर्दी और चकोर टोपी मैं उनका एक फोटो है उनके घर पर. वाह क्या मस्त दीखते है :-) पांचवी कक्षा मैं था तब उन्होंने मुझे ‘नवोदय विद्यालय’ का फॉर्म लाकर दिया था आगे पढने के लिए. मेरा आगे पढना तो तै था पर ‘नवोदय’ की बात ही कुछ और थी. उ. प्र. सर्कार का उपक्रम. फॉर्म भर पोस्ट कर दिया और रोल नंबर भी आ गया एक्साम देने के लिए पर जरा देर से. मेरे एक दोस्त का पहले आ गया और मैं रोने लगा की मेरा क्यों नहीं आया अभी तक. घर पर सब परेशान थे की इसे कैसे चुप कराये, कोई और दिन होता  तो दो झापड़ रसीद कर देते और दिलावर किसी कोने मैं सुबक रहे होते. पर आज सब ही परेशां थे. सभी सांत्वना देते. मम्मी वोली चलो ‘हनुमान चालीसा’ पद लो सब सही हो जायेगा. भगवान् मैं बिस्वास तो था ही चार बार पढ़ डाली. शाम को खबर आई की हेड मास्टर के पास आया है स्कूल के. चालीसा पढने के ६ घंटे बाद फल मिला , एक बार और पढनी चाहिए थी. खेर देर आये पर दुरुस्त आये. मैं फिर से हसने और बकने लगा. एक किताब मंगवाई गयी जो मौसा जी नही ही लाकर दी तेयारी करने के लिए. दुपहरी को इमली के नीचे और रात को लालटेन के आगे उसका सत बनने लगा.  सबसे मस्त बात परीक्षा के बारें मैं थी की वो बिजनोर मैं थी. आईला बिजनोर. जिला बिजनोर. शहर, बस में जायेंगे गाड़िया देखेंगे मजा आयेगा. पड़ोस के के टीचर हमें (मुझे और अमित को) बिजनोर एक्साम देने के लिए नियुक्त किया गया. मम्मी नही उन्हें ४०० थमा दिए की ख्याल रखना. हम सिओहरा से बस लेकर बिजनोर चले. खिड़की से बाहर तो मैं सिर्फ रोड को ही देख रहा था. हरियाली तो गाँव मैं बहुत देखी है. वो जो तारकोल की रोड है वोह सांसे ज्यादा रोमांचक थी. काली और एकदम सपाट. मजा आ गया था उस रोड को देखकर. बिजनोर पहुचे तो एक धरम्शाल मैं रुके. २५ रुपए किराये पर. मुझे याद है क्युकी मास्टर जी हिसाब लिखा रहे थे एक कॉपी में. उन्होंने मुझे ३ रुप्पी वाली पोलो लाकर दी. अहली बार मैंने कोई इतनी महंगी चीज खायी. या तो सिर्फ ५ पैसे वाली संतरे की टाफी या परले-जी बिस्किट्स. बिस्किट जब मेहमान घर पर आये हो. सब सबसे ज्यादा रोमांचक था पहली बार, पहली बार बिजली की रौशनी को देखना. मैंने उस बल्ब को इतना घूरा की १० मिनट तक मेरी आँखों के सामने फिलामेंट नजर आ रहा था. That was awesome. पता नहीं मेरे गाँव मैं बिजली कब आएगी. इतनी रौशनी, हे भगवान्. एक बार मेरे यहाँ पर आ जाये तो हम सब अलग अलग पढ़ सकेंगे. मुझे पसंद नहीं था की एक लंप के आगे तीन लोग एक साथ पढ़े जिनमे एक हमेशा सो जाता हो और दूसरा कीट-पतंगे पकड़ता हो. पर दोनों बही तो क्या करे कोई, एक छोटा एक बड़ा. एक को अधिकार ज्यादा एक को प्यार ज्यादा.
हम धरमशाला मैं ठहर गाये और मैंने पोलो खाखा ख़त्म कर दी. मस्त ठंडी ठंडी थी. कमरे मैं तो जगह थी नहीं इसलिए हमने अहाते मैं बिसतेर लगा लिया कोई दिक्कत नहीं आई क्युकी छत तो ऊपर थी ही. रात को तो मैं कभी देर तक नहीं पड़ता था. जल्दी सोना और जल्दी उठाना. कम से कम जब तक घर पर था तो ऐसा ही तह. यहाँ चेन्नई मैं तो समय से नाता ही टूट गया है. जब मन किया सो गाये, जब मन किया जाग गाये. वहा सुबह हुई तो बहुत सारे लड़के और लडकिया थी. अब लडकियों के सामने कौन नहायेगा. ब्रुश करो मुह धोया और तेयार हो जाओ. एक्साम देने पहुच गये. पेपर देकर घर आ गये वैसे वहा पर एक टीचर से कोई कुछ आकार बोल कर गया और वोह एक लड़की का पेपर सोल्वे करवाने लगा. ठीक है शहरी लोग कुछ करते होंगे. हम तो अपना पेपर दिए और शाम तक घर बापस भाग आये अगले दिन. फिर से सब कुछ पहले जैसा. रिजल्ट आ गया और selection नहीं हुआ. इलज़ाम गया कॉपी चेक करने वाले पर. इतने छोटे बच्चे पर कौन इलज़ाम थोपता.कोई कानून ही नहीं है. हाँ अगर मेरी मम्मी भी पढ़ी लिखी होती तो शायद मर कर ही उनके तानो से पीछा छूटता.

अक्टूबर ०२, २००६
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पापा अक्सर खेतो मैं काम करने के लिए लेकर जाते थे. किसान का बेटा काम नहीं करेगा तो और क्या करेगा. ऊपर से कोई आप्शन भी तो नहीं है. बड़ा भाई आसानी से काम करता था उसे मजा भी आता था पर मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं था. कोशिश करता की कोई बहाना मार दू. अक्सर बहाने कामयाब भी हो जाते थे पर ज्यादातर बार साथ जाना ही पड़ता था. गन्ने के खेत की निराई गुड़ाई, गाये भेंसों के लिए चारा लाना और बगेरह बगेरह छोटे मोटे काम लिए ही जाते थे. फावड़ा चलन तो बस मैं नहीं था उस उम्र मैं पर अगर मैं enthu  दिखता तो ट्रेनिंग मिल जाती. मैं अक्सर एक घटिया सा मुह बनाकर खेतो पर जाता और मन मारकर काम करता था. धान की रोपाई हो, गेहू की बुबाई या खेत तेयार करना हो, मक्का या चारी की कटाई. काम से बचने का सबसे अच्छा तारिका था की किताब लेकर बैठ जाओ. जब लगता था की पापा अब खेत पर जाने वाले है तो मैं समाधी लेकर अपनी किताबो के साथ बैठ जाता था. और उनके जाने तक का वेट करता था. :-) और उनके जाते ही बाहर जाकर गुल्ली डंडा.

मेरे गाँव मैं एक और दिलावर है. उसके घर का नाम है ‘सिफन’. उसे स्कूल जाना बिलकुल पसंद नहीं. कक्षा ६ मैं आया तो उसका दाखिला स्कूल मैं करवा दिया. पहले ही दिन उसे मार पड़ी. हर आकर रोने लगा, भानायक डर गया था वो. चार दिन तक बुखार आया और स्कूल का नाम सुनते ही चीखता था. कोई इतना परिश्रम करे तो सफलता तो मिलनी ही है. उसका नाम स्कूल से कटवा दिया और आजकल अपने दादा जी के साथ अपना पसंदीदा काम करता है खेती बारी , (update : his grandfather expired 6 month ago). मेरा फैन है. मुझे देखते ही बत्तीसी दिखा देता है, मुझे हंसी आ जाती है.

खेतो मैं काम करते वक्त, ऊँगली काटना, पैर का काटना, तातेय्या का काटना, जोंक, केकड़े इत्यादि आम बात है. एक दो बार ऊँगली काटी है. एक बार कुछ ज्यादा ही गहरी. फिर मैंने उसे धूल मैं कर लिया था ताकि कोई देख न ले डर के मारे. पर खून था की रुकता ही नहीं था. फिर बलराम जी नही देख लिया और मुझे पट्टी करने के लिए seohara ले गये. डांट नहीं लगी की क्यों दरांती के साथ खेल रहा था जब छोटा है तो. एक दो बार ही मैंने पैर कटा होगा. एक बार जोंक लग गयी थी तो मैंने उसपर तम्बाकू डालकर मार दिया उसे. जोंक पर नमक या तम्बाकू साल दो तो एकदम मर जाती है. नमक वाला फंडा तो सबको पता है जिसने शक्तिमान के साथ जोंक-जुनका  की लड़ाई देखी है. तातेय्या का काटना बहुत गन्दा होता है. जहा कटती है सुजा देती है. अकसर मुह पर ही कटती है. अजीब जानवर है कटेगी तो मुह पर. एक दिन तक आंख नहीं खुलती सुजन के मारे. सब हसते है की और भाई, मौसी ने काट लिया.

जिद करना गंदी बात. बचपन मैं यही सिखाया गया. ज्यादातर जिद नहीं की पर कभी कभी करनी पड़ती थी खासतोर से कपड़ो को लेकर. मक्का की खील खाने का भी लग ही मजा था. उसे लेने पर घर वालो की मनाही भी नहीं थी. मम्मी खुद ही चाट बनती थी और आलू के पराठे एकदम मस्त वाले.

दादी और मम्मी की ज्यादा नहीं पट्टी. खेर सास बहु के traditional रिश्ते के बारें मैं जितना कम बोलू उतना की अच्छा है. और है भी मेरे औकात से बाहर की बात. खेर जो भी हो मुझे तो उनकी लड़ाइ  में मजा सा आता था. मामाजी की मौत के एक महीने तक तो उनमे मत बोलचाल रही पर फिर पड़ोस की औरतो को ये बात हजम नहीं हुईं और षड़यंत्र रचे गये. नतीजा अब सामने है. खेर उनके रिश्तो की कडवाहट हम पर कभी नहीं थोपी गयी और ना ही हमने कभी इस बात को कोई भाव ही दिया.

पापा को typical इंडियन फाठेर ही रहे. बच्चो से कम बोलने वाले और जिद को philisophy से समझाने वाले. पापा बचपन मैं मुझे कभी पसंद नहीं आये. अब बात कुछ और है.

छोटा भाई दिनेश बचपन मैं बहुत ही दुबला पतला हुआ करता था . कुछ खाता था तो पचता नहीं था. दिन दिन सूख रहा था तब मैंने अपनी पाचवी की किताब से मम्मी को  एक घोल के बारें मैं बताया ‘dehydration ‘ घोल. हमने उसे उस दिन बनाया उसे चूहे (दिनेश) को पिने को दिया. taste तो ज्यादा अच्छा न था पर उस एबहुत फायदा हुआ. तो क्या हुआ खोज तो मेरी ही थी ना! :-) अब वो मुझे ‘चूहा’ बुलाता है. :-)

अक्टूबर ०४, २००६
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some other day,, feeling sleepy…  
        
  

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